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खोया पाया - कविता (अनुराग शर्मा)

कितना खोया कितना पाया
उसका क्या हिसाब करें हम

दर्पण पर जो धूल जमा है
उसको कैसे साफ करें हम

भूल चूक और लेना देना
कर्ज उधारी माफ करें हम

सपने भी अपने भी बिछडे
किस किस का संताप करें हम

नश्वर स्रष्टि नष्ट हुई तो
नूतन जग निर्माण करें हम

गुजरी बातें छोडो अब तो
उठने का सामान करें हम

© Anurag Sharma